Oct 11, 2010

रोते क्यू हो


अपने   घूंघट   से  यूँ  चेहरे  को  छुपाते  क्यू  हो ,

मुझ  से  शरमाते  हो  तो  सामने  आते  क्यू  हो ...


तुम  कभी  मेरे  तरह  कर  भी  लो  इकरार -ऐ- मोहबत ,

प्यार  करते  हो  तो  फिर  प्यार  छुपाते  क्यू  हो ...



अश्क  आँखों  में  मेरे  देख  के   रोते  क्यू  हो ,

दिल  भर  आता  है  तो  फिर  दिल  को  दुखते  क्यू  हो ...



रोज़  मर  मर  के   मुझे  जीने  को  कहते  क्यू  हो ,

मिलने  आते  हो  तो  फिर  लौट  के  जाते  क्यू  हो ...



अपने   घूंघट   से  यूँ  चेहरे  को  छुपाते  क्यू  हो ,

मुझ  से  शरमाते  हो  तो  सामने  आते  क्यू  हो ...


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विजय प्रताप सिंह राजपूत

9 comments:

  1. बहुत ही भावपूर्ण रचना . बधाई

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  2. bahut hee sundar gazal ...maja aa gaya padhkar...badhai

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  3. bahut badhiyalagaaapki gazal vaise to sabhi prashanshniy hain par kuchh panktiyan jyada hi behtar lagi.bahut hi achhi post.
    poonam

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  4. जनाब विजय प्रताप जी प्रयास अच्छा है ....
    अगली बार टंकण की गल्तियाँ नहीं होनी चाहिए ....

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  5. धन्यवाद हरकीरत ' हीर' जी कोशिश करेंगे

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